Monday, February 19, 2018

नया एक नाम दो




नया एक नाम दो
तुम
मुझे एक नाम दो

गुमराही ने घेर लिया था
गर्दिश में था खोया
गलियों से मैं बिछड़ के यारा
चैन से फिर ना सोया
पाँव सम्हलने लगे हैं मुझ को
तुम नया अंज़ाम दो.
मुझे एक नाम दो.

आम लोगों के आँसू-पीड़ा
और उन के ज़ज्बात
प्यार जमीं का भूल के मैं ने
कहाँ लगाईं आस?
लाल खून की स्याही भर दूँ
फिर
वही पैगाम दो.
तुम
मुझे एक नाम दो.

कोई था बम्मन कोई था बनिया
कोई हरिजन जात
इन्किलाब के ख्वाब ने कैसे
एक किये थे हाथ
नई नस्ल को जोड़ दूँ ऐसे
तुम
वही ईमान दो.
तुम
मुझे एक नाम दो,
नया एक नाम दो.

फीर भी सखे !




सुबहा से ले के शाम,करतीं हैं कितने काम
फीर भी सखे,हम तो अबला ठहरीं.

वो कहते हैं हमारे हाथ में नज़ाकत है ,
बिना देखे कि क्या क्या झेलते ये आफत हैं,
हमारे हाथ बर्फ़ जैसी ठण्ड से हैं लड़े,
हमारे हाथ गर्मियों की आंच से हैं पले,
कभी जलते कभी ठिठुरते सितारों को लिए थाम. सुबहा से .....


वो कहते हैं हमारा दिल नहीं है,चूहा हैं ,
बिना देखे कि जुल्म उस पे क्या क्या हुआ है,
हमने इस्पाती आफतों से टक्करें लीं हैं,
रूठे मझधार से किनारे कश्तियाँ कीं हैं,
सर पे आकाश नहीं,टांपता रहता है दुःख तमाम.  सुबहा से .....

वो कहते हैं हमारे पाँव छोटे छोटे हैं,
बिना देखे कि बोज धरती का ये ढोते हैं,
हमारे पाँव से रोशन बना घर का चेहरा,
हमारे पाँव से ही बाग बनें हर सेहरा,
ये चलें तब तो उन्हें मिल सकीं हैं मंजिलें तमाम. सुबहा से ......


वो कहते हैं की हम तो काम कुछ नहीं करतीं,
फ़िर भी हम बिन तो उन की दाल भी नहीं गलतीं,
चंद ही रोज में घरकाम से थक जाते हैं वो,
सारे घर का है हम पे बोज देख पाते हैं वो ?
उन के सिर्फ़ हाथ हैं,लिंग हैं,आँखों का नहीं नाम.
सुबहा से लेके शाम,करतीं हैं कितने काम,
फ़िर भी सखे,हम तो अबला ठहरीं.

निकली है सवारी


        














तेरी मूछें थर थर कांपेगी देख नीकली है सवारी
आठ आसमान चुमने के वास्ते हैं आज मैं ने पाँखे फैलाई 
सात सागर में  घुमने को हाथों के चप्पों से नैया चलाई 

खुली जमीन ऊपर,खुले आसमां के नीचे
कोई ऊंचा नहीं था,कोई नीचा नहीं था
खुली जमीं ऊपर,खुले आसमां के नीचे
नीकल आया एक घर
 जिस की नींव में लहु मांस मेरा भरा
मेरे सपनें तूटे,हाथ उलटे बंधें,
चींथडी बन के आकाश जिस के फर्श पे सिमटा
मेरी आंखो की आरपार देख आज नीकली है उस की निशानी
आठ आसमान चुमने के वास्ते हैं आज मैं ने पाँखे फैलाई  
सात सागर में  घुमने को हाथों के चप्पों से नैया चलाई 


अब तो क्षितिज खुली,नयी दुनिया झूली
आज तू भी मानव
और मैं भी मानव
अर्थ मानव का एक ही है – मानव मानव
आज क्षितिज खुली,नयी दुनिया झूली
गुरु वही का वही,शनी वही का वही
किन्तू देखने की रीत आज बिलकुल नयी
पाँव घूमते हुए,हाथ मजबूत हुए
बंध कंठ से मयूर अब गह्कने लगे
सूखी ऊँगलियाँ छलकीं कि टेरों से छूटी सर्जन की सरवानी
आठ आसमान चुमने के वास्ते हैं आज मैं ने पाँखे फैलाई   
सात सागर में  घुमने को हाथों के चप्पों से नैया चलाई 

लफ्ज़ की कश्तियाँ














दीप जलते रहें,हम पिघलते रहें
खैर आंसु की महेफिल तो चलती रही

खास बातें तो ऐसी नहीं थीं मगर
वो ही बातें ज़मीं में पनपती रहीं

मेरी माँ ने मुझे पाला था उस तरह
याद उन की मेरे दिल में पलती रही

सर में तूफ़ान था दिल में उफान था
फ़िर वो ही आग क्यूँ ठण्ड बनती रही

मेरे पैरों ने चलना मना कर दिया
मंजिलें मेरी नब्ज़ों में खलती रहीं

रोते रोते मेरे हाथ भर आये और
लफ्ज़ की कश्तियाँ फ़िर उछ्लतीं रहीं

दिखाते हैं




रात में आँसू ही आँखों में उमड़ आते हैं
आज भी हम को वो इतना तो याद आते है

जिन्हें चाहा उन्हें मिलना अभी मुमकिन नहीं
सब ईस शहर से भी दूर दूर बसने जाते हैं

इतने टूटे हुए ख्वाबों को ले के जीते हैं
आज हम ही हमें बिखरे से नज़र आते हैं

वो ही उम्मीद वो ही आरजू जिगर में है
जलने लगते हैं अन्धेरों में बैठ जाते हैं

वो कहेंगें कि तुम बहुत बदल गए ‘साहिल’
मिला के आँख कहेंगे ‘जो हैं’’ दिखाते हैं

पहुँचे




जैसे दरिया का आब आसमां तलक पहुँचे,
मेरे ये दर्द तेरे जिस्मों जाँ तलक पहुँचे.

बदन था दूर जिगर की तो फ़िर क्या बात कहें,
बात ऐसी चली कि हम वहाँ तलक पहुँचे.

एक चुप्पी की तरह जी रहे थे सदियों से,
आज अल्फ़ाज बन के हम कहाँ तलक पहुँचे.

रिश्ते की धूपछाँव




तू एक बड़ा शहर है,जानम
मैं छोटा सा गाँव
मर्सीडीज़ की तेज दौड तू
मैं हूँ बंधे पाँव
देक्ख रहा हूँ रिश्ते की धूपछाँव.

मैं हूँ सस्ती महज गरीबी
तू है महंगी बड़ी करीबी
सागर जैसा दिल तेरा है
मैं छोटी सी नाँव
देख रहा हूँ रिश्ते की धूपछाँव.

भरे बदन पे शीतल चाँद का चमकीला तू रूप
तर पसीने से चेहरा हूँ मैं ज्यों बैशाखी धूप
नज़र मिलाते डर लागै कि
नज़र में तेरी पड़ जाये ना
मैल के गहरे घांव
देख रहा हूँ रिश्ते की धूप छांव

एक ‘ढ’ गज़ल

तन्हाइयाँ तन्हाइयाँ तन्हाइयाँ हैं यह चौदवें अक्षर से सब रुस्वाइयाँ हैं कैसा बिछाया ज़ाल तू ने अय मनु कि हम ही नहीं पापी यहाँ प...